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ये भूलना होगा तुम्हें, अब खुलना होगा तुम्हें

बहुत घुटी - घूटी सी रहती हो बस खुलती नहीं हो तुम खुलने के लिए जाना होगा तुम्हें बहुत पीछे एक छोटी सी बात  सायद समझती नहीं हो तुम फिर वहीं जाना होगा जहां से कंधों पर बस्ता उठा कर चलना शुरू किया था.... उस जहन को बदल एक नया जहन लगना होगा तुम्हें.... क्या गांव की लड़की हो? अब ये भूलना होगा तुम्हें अब वक़्त आ गया है खुलना होगा तुम्हें, हां अब खुलना होगा तुम्हें...                     
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कोचिंग का वो पहला प्यार...समीर की कलम

आज कोचिंग में मेरा पहला दिन था....हां ये भी कह सकते हैं कि एक नई दुनिया में हमारा पहला दिन था...हम दोनों क्लास में साथ ENTRY करते हैं..पूरे टशन में...जैसे अपुन इच्च भगवान है...कितना अजीब था वो...दोनो में वो जो दुसरा आदमी था न उसका नाम शिवम नाम है उसका...ये कोई पहला मौका नहीं था..जब हम किसी क्लास में पहली बार साथ इंटर कर रहे हों...आप से शुरु हुई पहचान कब तुम से तू तक पहुंची थी पता हीं नहीं चला था...अभी की ही थी तो बात थी पहले दिन क्लास जाने के एक्साइटमेंट में हम कुछ जल्दी ही कोचिंग पहुंच गए थे...कुछ फार्मीलीट्ज हुई फिर हमें हमारी सीट बता दी गई थी....हां ये अलग बात थी कि उसके साथ होने पर मैं ओवर कर देता था...ओवर तो समझते ही होंगे न क्रिकेट वाला नहीं...                 हां तो इस आदत से मजबूर मैं कुछ ज्यादा करने की मूड में आ चुका था...पर हमें सर  की तारिफों के किस्से पहले हीं सुना दिये गए थे....जो शिवम ने मुझे फिर से याद दिलाई...मैं दुसरे बैंच पर बैठ गया...मैं मतलब हम -मैं और शिवम.....सर क्लास में आये और पढाना शुरु किया...न हमें कुछ में सम...

सरस्वती पूजा...कहानियों के बनने का सिलसिला

सरस्वती पूजा हमारे क्षेत्र में पूजा से बढ कर बहुत कुछ होता है...कितनी ही कहानियों का साक्षी होता है स्कूल का वो कैंपस.... कहानियों के बनने का सिलसिला होता है .... वो छोटी - सी पीली थैली , जिसमे ना जाने वो   कितने कीमती अबीर छुपा कर रखी थी । शायद ! पूजा के बाद सभी को तिलक लगाने के लिए खरीद कर लायी होगी ।         मैं पीतल की थाली में मोटे -मोटे गाजर को काट कर प्रसाद बना रहा था । हम सभी विद्यार्थियों ने चंदा एकत्रित कर सरस्वती पूजा का आयोजन   किये थे । कुछ बच्चे पैसे ना देकर कुछ पूजा के समान या कोई प्रसाद के लिए फल दिया था । ये वो ही गाजर थी   , जिसे विक्रम ने प्रसाद   के लिए अपने खेतों से उखाड़ कर लाया था।   गाजर मोटी रहने के कारण हम उस गाजर   के लिए उसका मजाक बना रहे थे ।   वो बेचारा चुप- चाप एक कोने में बैठ कर पताके काट रहा था और हम कुछ दोस्तों के साथ ठिठोली कर के प्रसाद काट रहे थे...ये अक्सर होता है इन बातों में सब खोये थे , लेकिन मेरी आँखें सिर्फ उसे ही ढूढ   रही थी । हां उसे...उसका मतलब तो समझते ...

कुछ कहानियां अधूरी ही छूट जानी चाहिए---

हां सच कुछ कहानियों का अधुरा छुट जाना ही अच्छा होता है उसकी मुकम्मल मुस्कान को अधुरा छोड़ जाना ही अच्छा होता जैसे उसकी चिट्ठी का आना , और बिना पढे ही तेरा मुस्कुराना... हां ये अच्छा होता है , कुछ कहानियों का अधूरा छुट जाना ही अच्छा होता है. मेरी बात का जवाब न आना ही अच्छा होता.... तेरा मुझे देख न मुस्कुराना ही अच्छा होता … हमारा आपसे न टकराना ही अच्छा होता है... कुछ कहानियों का अधूरा छुट जाना ही अच्छा होता... अक्सर कहती हैं ये तुम्हारी आँखों ने.... बहुत धोखा दे दिया और अब तुम्हें देखना अच्छा नहीं लगता... मेरी भी जिंदगी ऐसे तो है मुक्कबल.... पर तू होती तो शायद अच्छा होता..... एक मुकम्मल मुलाकात का अधूरा छूट जाना ही अच्छा होता.. कुछ कहानियों का अधूरा छूट जाना ही अच्छा होता।

सिमरिया विधानसभा क्षेत्र मेरा अपना विधानसभा क्षेत्र की चुनावी आवो-हवा पर एक नजर.......समीर की कलम

सिमरिया विधानसभा क्षेत्र मेरा अपना विधानसभा क्षेत्र की चुनावी आवो-हवा पर एक नजर.......समीर की कलम सिमरिया विधानसभा क्षेत्र में अपना विधानसभा क्षेत्र.....दुनिया भर के मुद्दों पर लिखता रहा हुं... समीक्षात्मक हो आलोचनात्मक...किसी न किसी तरह से अपनी बात रखने की कोशिस की है.... पर शायद सिमरिया और आस-पास की राजनीति से दूरी रही है...इसके कई कारण हैं....कम उम्र में क्षेत्र से कट जाना इसमें से महत्वपूर्ण है....क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था हालत ऐसी है की ज्यादातर लोग पहले पढाई और फिर नौकरी के लिए क्षेत्र को छोड़ने पर मजबूर हैं... खैर आज दिन समस्याओं को गिनाने का नहीं राजनीति प्रिदृश्य पर चर्चा का है...झारखंड में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं.... पत्रकार होने के नाते हर विधानसभा क्षेत्र की बुनियादी जानकारी हमें हो ही जाती है या यूं कहुं की काम का हिस्सा होने के कारण हम चिजों को लेकर संजिदा रहते हैं.....सिमरिया की राजनीति से हमेंशा दूरी का कारण ये भी रहा की सायद चिजों को लेकर वो समझ नहीं जो बाकी देश के बारे में हो.... राष्ट्रीय राजनीति से लेकर क्षेत्रीय तक सभी प्रोजेक्ट का पार्ट होने के कारण देश...

रांची से 65 किमी दूर “मिनी लन्दन” मैकलुस्कीगंज में आपका स्वागत है...

झारखंड की राजधानी रांची से कुछ दूरी पर है, 'एंग्लो इंडियंस' की बस्ती जो सैलानियों के लिए आकर्षण के केंद्र बन जाता है... चलिए आपको लिए चलता हूँ मैक्लुसकीगंज के सफ़र में... इतिहास... मैकलुस्‍कीगंज नाम ही ऐसा है जो सबको बेहद आकर्षि‍त करता है. लगता ही नहीं कि‍ यह झारखंड के कि‍सी हि‍स्‍से का नाम है. इसे ‘ मि‍नी लंदन’  भी कहा जाता है. आदि‍वासी प्रदेश का एक गांव जहां एंग्लो इंडियंस बसे हैं , जि‍नकी बोलचाल और संस्‍कृति‍ देसी भी है और वि‍देशी भी. वे लोग दशहरे मेंं मेला भी घूमते हैं और चर्च जाने के साथ-साथ क्‍लब में भी होते हैं. दरअसल इस जगह का नाम था लपरा, जि‍से मैकलुस्‍की टि‍मोथी ने बसाया था. इसके पीछे भी एक कहानी है. जब अंग्रेज भारत आए तो अपने राजपाट के प्रसार के लि‍ए पटरि‍यां बि‍छाकर रेल चलाई, पोस्‍ट आफि‍स बनाया. यहां काम करने के लि‍ए अंग्रेज हिन्दुस्तान बुलाए गये क्‍योंकि‍ जब तक भारतीय यह काम नहीं सीख जाते, उन्‍हें अंग्रेजों की जरूरत पड़ती ही थी. मैकलुस्‍की के पि‍ता आयरि‍श थे और रेलवे में नौकरी करते थे. जब वो बनारस पोस्‍टेड थे तो एक ब्राह्मण लड़की से प्‍यार कर बैठे और तमाम...

शायर की दुनिया.....

तुम क्या जानों उस दरिया पर क्या बीती तुमने तो बस पानी भरना छोड़ दिया...... इस शहर की तबियत कुछ नासाज़ सी लगती है, क्या तुमने सच में मुस्कुराना छोड़ दिया?