Skip to main content

रांची से 65 किमी दूर “मिनी लन्दन” मैकलुस्कीगंज में आपका स्वागत है...

झारखंड की राजधानी रांची से कुछ दूरी पर है, 'एंग्लो इंडियंस' की बस्ती जो सैलानियों के लिए आकर्षण के केंद्र बन जाता है... चलिए आपको लिए चलता हूँ मैक्लुसकीगंज के सफ़र में...


इतिहास...

मैकलुस्‍कीगंज नाम ही ऐसा है जो सबको बेहद आकर्षि‍त करता है. लगता ही नहीं कि‍ यह झारखंड के कि‍सी हि‍स्‍से का नाम है. इसे ‘ मि‍नी लंदन’  भी कहा जाता है. आदि‍वासी प्रदेश का एक गांव जहां एंग्लो इंडियंस बसे हैं , जि‍नकी बोलचाल और संस्‍कृति‍ देसी भी है और वि‍देशी भी. वे लोग दशहरे मेंं मेला भी घूमते हैं और चर्च जाने के साथ-साथ क्‍लब में भी होते हैं. दरअसल इस जगह का नाम था लपरा, जि‍से मैकलुस्‍की टि‍मोथी ने बसाया था. इसके पीछे भी एक कहानी है.

जब अंग्रेज भारत आए तो अपने राजपाट के प्रसार के लि‍ए पटरि‍यां बि‍छाकर रेल चलाई, पोस्‍ट आफि‍स बनाया. यहां काम करने के लि‍ए अंग्रेज हिन्दुस्तान बुलाए गये क्‍योंकि‍ जब तक भारतीय यह काम नहीं सीख जाते, उन्‍हें अंग्रेजों की जरूरत पड़ती ही थी. मैकलुस्‍की के पि‍ता आयरि‍श थे और रेलवे में नौकरी करते थे. जब वो बनारस पोस्‍टेड थे तो एक ब्राह्मण लड़की से प्‍यार कर बैठे और तमाम वि‍रोध के बाद भी उन दोनों ने शादी कर ली.

 


पि‍ता वि‍देशी, मां देसी और उनसे उत्‍पन्‍न बच्‍चे दोनों संस्‍कृति‍यों को देखते और कहीं स्‍वीकार्य कहीं अस्‍वीकार्य होते, महसूस करते बड़े हुए. ऐसे में मैकलुस्‍की भी अपने समाज की छटपटाहट बचपन से देखते आए थे. अपने समुदाय के लि‍ए कुछ करने की भावना शुरू से उनके मन में थी. ऐसे में जब 1930 के दशक में साइमन कमीशन की रि‍पोर्ट में एंग्‍लो-इंडि‍यन समुदाय के प्रति‍ अंग्रेज सरकार ने कि‍सी भी तरह की जि‍म्‍मेदारी नहीं ली, तो उनके सामने अपने अस्‍ति‍त्‍व का ही संकट खड़ा हो गया. तब मैकलुस्‍की ने तय कि‍या कि‍ एंग्‍लो-इंडि‍यन समुदाय के लि‍ए भारत में ही एक गांव बसाएंगे.

प्रॉपटी डीलिंग व्‍यवसाय से जुड़े टि‍मोथी जब बि‍हार के रांची-पलामू के बीच इस जगह पर पहुंचे तो यहां की आबोहवा और जामुन, करंज, सेमल, महुआ, आम के पेड़ देखकर इतने मोहि‍त हुए कि‍  एंग्‍लो-इंडि‍यन परिवारों को यहीं बसाने का नि‍र्णय कर लिया


कुछ फैक्ट्स-

एंग्‍लो-इंडि‍यन के अलावा बाद में सेना के अवकाश प्राप्‍त अधि‍कारी और कलकत्‍ता के लोगों ने भी मैकलुस्‍कीगंज में बंगला खरीदा. यहां अभी भी लोग अभि‍नेत्री अपर्णा सेन का बंगला देखने जाते हैंं.  बांग्‍ला उपन्‍यासकार बुद्धदेव गुहा ने भी बंगला खरीदा था और मैक्लुस्‍कीगंज पर लि‍खे उपन्‍यास के कारण भी मैक्लुस्‍कीगंज कोलकातावासि‍यों में लोकप्रि‍य हुआ.

अपर्णा सेन ने फि‍ल्‍म 36 चौरंगी लेन की पटकथा मैक्लुस्‍कीगंज से प्रेरि‍त होकर ही लि‍खी थी और अभी कोंकणा सेन शर्मा ने फि‍ल्‍म बनाई है ‘डेथ इन द गंज.’
उल्लेखनीय है कि विकास झा के मैक्लुस्कीगंज पर पर लिखे उपन्यास ” मैक्लुस्कीगंज”  को इंदुकथा सम्मान प्राप्त हुआ है

” मैक्लुस्कीगंज”-मेरी नजरों से-

” मैक्लुस्कीगंज” से जब सभी लोग यहां छोड़कर जाने लगे तो एक समय सन्‍नाटा छा गया था. लगता था मैकलुस्‍कीगंज का अस्‍ति‍त्‍व मि‍टने को है. एक तरफ नक्‍सलि‍यों के कारण पर्यटक नहीं आते तो दूसरी ओर बेरोजगारी की मार. इस बीच आशा की कि‍रण तब फूटी, जब  जब वर्ष 1997 में बिहार के मनोनीत एंग्लो इंडियन विधायक अल्फ्रेड डी रोजारियो ने डॉन बॉस्को एकेडमी की एक शाखा मैक्लुस्कीगंज में खोल दी. इस स्कूल  झारखंड और बाहर के एक हजार से अधिक बच्चे हैं.

रांची से 10KM आगे निकलते ही आप महसूस करने लगेंगे की आप एक अच्छे सफर के लिए निकल चुके हैं। झारखंड की आवो हवा जिसके लिए हम जाने जाते हैं आपको इसकी झलक मिलनी शुरू हो जायेगी।
मैकलुस्‍कीगंज की सीमा शुरू होते ही आप थोड़े कंफ्यूज होंगे की आपको अपनी आँखों में समेटना क्या क्या है? एक ओऱ पलाश महुआ आम लीची के जंगल आपको अपनी ओऱ आकर्षित करेंगे तो दूसरी ओऱ वर्षो पुराने बंगलों की सजावट आपके मन में कौतूहल पैदा कर देगी। जंगलों की बीच में अचानक से आपके आँखों के सामने एक बसा-बसाया घर सामने आएगा। जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सजते थे। रख रखाव का अभाव तो दिख रहा था, पर सायद इससे कोई खाश फर्क पड़ा नहीं। पैदल के कुछ सफर ने हमें रोमांचित कर दिया था। हम अपनी मंजिल के करीब थे।




रसोई और उसकी चाय-

चाय का कोई खास सौख तो नहीं पर रसोई से एक जुड़ाव सा रहा है, पेड़ पौथो की डालियों सी लिपटी रसोई की बोर्ड किसी कभी खुशहाल रही रसोई की याद दिला रही है।



क्या खूबसूरत पल रहे होंगे वो ये सोच कर थॉड़ी सिरहन सी महसूस हुई हम आगे बढे लोगों से मुलाकात हुई तो बात इसिहास की निकली बातों ही बातो में चाय हाज़िर थी अमूमन यहाँ ये मिलना थोड़ा मुश्किल है पर हमारे पहुँचने की सुचना होने के कारण हमें चाय मिल गया, निम्बू की चाय आपको पहली महब्बत की याद तो दिल ही देगी



अगर जिंदगी को सही मायनों में जीना चाहते हैं, प्रकृति की छटा में बसी एक ऐतेहासिक धरोहर को देखना चाहते हैं। शहर से उबन सी होती है तो आपको एक बार यहाँ आना चाहिए। पर इन सबसे भी महत्वपूर्ण अगर कुछ अच्छा जनना और देखना चाहते हैं तो आपको मैक्लुस्कीगंज आना चाहिए।





Comments

Popular posts from this blog

कुछ कहानियां अधूरी ही छूट जानी चाहिए---

हां सच कुछ कहानियों का अधुरा छुट जाना ही अच्छा होता है उसकी मुकम्मल मुस्कान को अधुरा छोड़ जाना ही अच्छा होता जैसे उसकी चिट्ठी का आना , और बिना पढे ही तेरा मुस्कुराना... हां ये अच्छा होता है , कुछ कहानियों का अधूरा छुट जाना ही अच्छा होता है. मेरी बात का जवाब न आना ही अच्छा होता.... तेरा मुझे देख न मुस्कुराना ही अच्छा होता … हमारा आपसे न टकराना ही अच्छा होता है... कुछ कहानियों का अधूरा छुट जाना ही अच्छा होता... अक्सर कहती हैं ये तुम्हारी आँखों ने.... बहुत धोखा दे दिया और अब तुम्हें देखना अच्छा नहीं लगता... मेरी भी जिंदगी ऐसे तो है मुक्कबल.... पर तू होती तो शायद अच्छा होता..... एक मुकम्मल मुलाकात का अधूरा छूट जाना ही अच्छा होता.. कुछ कहानियों का अधूरा छूट जाना ही अच्छा होता।

सिमरिया विधानसभा क्षेत्र मेरा अपना विधानसभा क्षेत्र की चुनावी आवो-हवा पर एक नजर.......समीर की कलम

सिमरिया विधानसभा क्षेत्र मेरा अपना विधानसभा क्षेत्र की चुनावी आवो-हवा पर एक नजर.......समीर की कलम सिमरिया विधानसभा क्षेत्र में अपना विधानसभा क्षेत्र.....दुनिया भर के मुद्दों पर लिखता रहा हुं... समीक्षात्मक हो आलोचनात्मक...किसी न किसी तरह से अपनी बात रखने की कोशिस की है.... पर शायद सिमरिया और आस-पास की राजनीति से दूरी रही है...इसके कई कारण हैं....कम उम्र में क्षेत्र से कट जाना इसमें से महत्वपूर्ण है....क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था हालत ऐसी है की ज्यादातर लोग पहले पढाई और फिर नौकरी के लिए क्षेत्र को छोड़ने पर मजबूर हैं... खैर आज दिन समस्याओं को गिनाने का नहीं राजनीति प्रिदृश्य पर चर्चा का है...झारखंड में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं.... पत्रकार होने के नाते हर विधानसभा क्षेत्र की बुनियादी जानकारी हमें हो ही जाती है या यूं कहुं की काम का हिस्सा होने के कारण हम चिजों को लेकर संजिदा रहते हैं.....सिमरिया की राजनीति से हमेंशा दूरी का कारण ये भी रहा की सायद चिजों को लेकर वो समझ नहीं जो बाकी देश के बारे में हो.... राष्ट्रीय राजनीति से लेकर क्षेत्रीय तक सभी प्रोजेक्ट का पार्ट होने के कारण देश...

सरस्वती पूजा...कहानियों के बनने का सिलसिला

सरस्वती पूजा हमारे क्षेत्र में पूजा से बढ कर बहुत कुछ होता है...कितनी ही कहानियों का साक्षी होता है स्कूल का वो कैंपस.... कहानियों के बनने का सिलसिला होता है .... वो छोटी - सी पीली थैली , जिसमे ना जाने वो   कितने कीमती अबीर छुपा कर रखी थी । शायद ! पूजा के बाद सभी को तिलक लगाने के लिए खरीद कर लायी होगी ।         मैं पीतल की थाली में मोटे -मोटे गाजर को काट कर प्रसाद बना रहा था । हम सभी विद्यार्थियों ने चंदा एकत्रित कर सरस्वती पूजा का आयोजन   किये थे । कुछ बच्चे पैसे ना देकर कुछ पूजा के समान या कोई प्रसाद के लिए फल दिया था । ये वो ही गाजर थी   , जिसे विक्रम ने प्रसाद   के लिए अपने खेतों से उखाड़ कर लाया था।   गाजर मोटी रहने के कारण हम उस गाजर   के लिए उसका मजाक बना रहे थे ।   वो बेचारा चुप- चाप एक कोने में बैठ कर पताके काट रहा था और हम कुछ दोस्तों के साथ ठिठोली कर के प्रसाद काट रहे थे...ये अक्सर होता है इन बातों में सब खोये थे , लेकिन मेरी आँखें सिर्फ उसे ही ढूढ   रही थी । हां उसे...उसका मतलब तो समझते ...