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उड़ान हौसलें क़ि....

यूपी से चली थी,वो भारत का मान बढ़ाने,
जीत कर लौटूंगी पापा ये वादे थे उसे निभाने।


पर समय के कूर्क जाल से कौन था बच पाया..
तारीख थी वो ग्यारह जब वक्त भी ठहर गया था।

लोगों की सोच पर तब भारत माँ भी रोइ थी।
जब काटे पैर के साथ पटरी पर जब अरुणिमा सिन्हा सोई थी।

उठी हताशा से थी जब वो,दिन कुछ बीत चुके थे, हुई अपाहिज अब तु अरुणिमा लोगों ने खूब कहे थे।

तब मिली बछेन्द्री पाल से थी वो हिमालय पर चढ़ने की ठानी थी,
सोच ही होती है अपाहिज ये बात तो उसे बतानी  थी।

फिर वो वक्त भी आया जब काल भी थर्राया था..
देख  हौसला एक लड़की का हिमालय ने शीश झुकाया था।

ये जीत सिर्फ जीत नहीं एक पैगाम वो लाई थी,
सोच ही होती है अपाहिज ये बात उसने समझाई थी।

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