यूपीएससी में हिंदी भाषा के छात्रों के चयन में आई कमी का जिम्मेदार कौन ?
यूपीएससी यानि भारत के उस समाज का सपना जिसके सच होने का इंतेज़ार मध्यम वर्गीय परिवार के हर बच्चे को होता है। यूपी-बिहार में तो एक कहावत भी है कि यहां के लड़कों का दिल टूटता है तो सीधा यूपीएससी निकालते हैं।
पर सरकार की एक नीति ने इन सपनो और कहावतों को एक तगड़ा झटका दिया है। जिसका नाम है सीसैट(CSAT)
हिंदी-भाषी छात्रो के लिए यह किसी अभिषाप से कम नहीं आंका जा सकता। आप इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि साल 2018 , जगह मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री रास्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी। यहां पर 370 लोग ट्रेनिंग ले रहे थे, सब के सब देश के भावी IAS थे। देश के कोने-कोने से आए IAS और इनमें हिंदी भाषा के सिर्फ और सिर्फ 8 IAS। यानि कि सफल हुए कुल छात्रों का महज 2.16 फीसदी।
थोड़ा पीछे चलते हैं 2013 इसी लाल बहादूर शास्त्री प्रशसनिक अकादमी में 202 IAS अधिकारी ट्रेनिंग ले रहे थे। जिनमें से हिंदी भाषा में परीक्षा देने वालों की संख्या थी 48 यानि कि सफल हुए कुल छात्रों का करीब 17 फीसदी।
ये दो आंकड़े हैं जो यूपीएससी की तस्वीर बयां करने के लिए काफी हैं।
स्पष्ट तौर देखा जा सकता है कि अब हिंदी मीडिया से चुने जाने वाले छात्रों की संख्या लगातार घटती जा रही है। और इसकी वजह है सीसैट।
मनमोहन सरकार का एक फैसला जिसने हिंदी भाषा के छात्रों को उनके सपने से दूर दिया। 2011 के बाद से लगातार हिंदी भाषी छात्रों का दोहन सीसैट ने किया है।
वर्तमान सरकार...
लगातार हो रही आंदोलनों और विरोध के बाद मोदी सरकार ने एक फैसला किया कि अब सीसैट के पेपर में सिर्फ पासिंग नम्बर हीं लेन होंगे यानी 33%
यूपीएससी सुधार कमेटी की रिपोर्ट...
इसमें साफ कहा गया है कि सीसैट आने के बाद हिंदी भाषा के छात्रों को इस पेपर को पास करने के लिए हीं काफी मेहनत करनी पड़ती है। और इंग्लिश क ऐसेे छात्र जिनकी सामान्य ज्ञान काफी कम होती है, वो भी आसानी से इस पेपर को क्वीलिफ्य कर लेते हैं। और सीसैट की वजह से हिंदी भाषा के छात्र पहले दौर से हीं बाहर हो जाते हैं।
सवाल हीं गलत तो जवाब क्या ?
जी हां यूपीएससी के सवाल को इंग्लिश में तैयार किया जाता है। और उसके अनुवाद के लिए गूगल ट्रांसलेटर की मदत ली जाती है।
जिससे कई बार सवालों का पूरा ढांचा हीं बदल जाता है तो कई बार सवालो में काफी गलतियां होती हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब सवाल हीं गलत होंगे तो उसका जवाब सही कैसे हो सकता है।
एक तरफ तो हम विश्व हिंदी सम्मलेन मॉरीशस में करते हैं, दूसरी तरफ देश में हीं हिंदी के साथ भेद-भाव हो रहा है।
यूपीएससी यानि भारत के उस समाज का सपना जिसके सच होने का इंतेज़ार मध्यम वर्गीय परिवार के हर बच्चे को होता है। यूपी-बिहार में तो एक कहावत भी है कि यहां के लड़कों का दिल टूटता है तो सीधा यूपीएससी निकालते हैं।
पर सरकार की एक नीति ने इन सपनो और कहावतों को एक तगड़ा झटका दिया है। जिसका नाम है सीसैट(CSAT)
हिंदी-भाषी छात्रो के लिए यह किसी अभिषाप से कम नहीं आंका जा सकता। आप इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि साल 2018 , जगह मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री रास्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी। यहां पर 370 लोग ट्रेनिंग ले रहे थे, सब के सब देश के भावी IAS थे। देश के कोने-कोने से आए IAS और इनमें हिंदी भाषा के सिर्फ और सिर्फ 8 IAS। यानि कि सफल हुए कुल छात्रों का महज 2.16 फीसदी।
थोड़ा पीछे चलते हैं 2013 इसी लाल बहादूर शास्त्री प्रशसनिक अकादमी में 202 IAS अधिकारी ट्रेनिंग ले रहे थे। जिनमें से हिंदी भाषा में परीक्षा देने वालों की संख्या थी 48 यानि कि सफल हुए कुल छात्रों का करीब 17 फीसदी।
ये दो आंकड़े हैं जो यूपीएससी की तस्वीर बयां करने के लिए काफी हैं।
स्पष्ट तौर देखा जा सकता है कि अब हिंदी मीडिया से चुने जाने वाले छात्रों की संख्या लगातार घटती जा रही है। और इसकी वजह है सीसैट।
मनमोहन सरकार का एक फैसला जिसने हिंदी भाषा के छात्रों को उनके सपने से दूर दिया। 2011 के बाद से लगातार हिंदी भाषी छात्रों का दोहन सीसैट ने किया है।
वर्तमान सरकार...
लगातार हो रही आंदोलनों और विरोध के बाद मोदी सरकार ने एक फैसला किया कि अब सीसैट के पेपर में सिर्फ पासिंग नम्बर हीं लेन होंगे यानी 33%
यूपीएससी सुधार कमेटी की रिपोर्ट...
इसमें साफ कहा गया है कि सीसैट आने के बाद हिंदी भाषा के छात्रों को इस पेपर को पास करने के लिए हीं काफी मेहनत करनी पड़ती है। और इंग्लिश क ऐसेे छात्र जिनकी सामान्य ज्ञान काफी कम होती है, वो भी आसानी से इस पेपर को क्वीलिफ्य कर लेते हैं। और सीसैट की वजह से हिंदी भाषा के छात्र पहले दौर से हीं बाहर हो जाते हैं।
सवाल हीं गलत तो जवाब क्या ?
जी हां यूपीएससी के सवाल को इंग्लिश में तैयार किया जाता है। और उसके अनुवाद के लिए गूगल ट्रांसलेटर की मदत ली जाती है।
जिससे कई बार सवालों का पूरा ढांचा हीं बदल जाता है तो कई बार सवालो में काफी गलतियां होती हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब सवाल हीं गलत होंगे तो उसका जवाब सही कैसे हो सकता है।
एक तरफ तो हम विश्व हिंदी सम्मलेन मॉरीशस में करते हैं, दूसरी तरफ देश में हीं हिंदी के साथ भेद-भाव हो रहा है।


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