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एक सफर

     एक सफर

' हर दिन देश में ना जाने कितने लोग यात्रा करते हैं'। यह कहानी ऐसी हीं एक किसी अदना-सी-सफर की पृष्टभूमि पर आधारित है।,


    "इस कहानी में प्यार जैसा कुछ है तो नहीं पर यह भी नहीं कह सकते हैं कि प्यार जैसा कुछ भी नहीं" बात थोड़ी अलग है समझ गये तो ठीक नहीं तो आगे बढिये। 
कहानी राँची के छोटे से शहर के रेलवे स्टेशन में खड़ी NSDL- राँची राजधानी की 3rd AC के एक डिब्बे से शुरू होती है। हर दिन हर पल कितनी हीं कहानियां हमारे आँखों के सामने से गुजर जाती है, जिसकी शायद हमें खबर तक नहीं होती कुछ एक कहानियों जो हम अपनी कलम से कैद कर पाते हैं और उसे हीं शब्द देकर हमेशा के लिए अमर करना चाहते हैं।
चलिए ज्यादा घूमें बिना कहानी में वापस आते हैं। क्या करिश्मा होता है न कभी-कभी किसी के मिल कर बिछुड़ने से हम खुद से नाराज हुए फिरते हैं और कभी-कभी फिर मिलेंगे की एक छोटी सी उम्मीद हमें कितना खुश कर देती है।
हमारी कहानी में दो मुख्य किरदार हैं। ऐसे इस कहानी में किरदारो के नाम रखे जाय इसकी कोई खास आवश्यकता है नहीं और यही बात इसे एक कहानी बनाती है। पर फिर भी खुद को तसल्ली देने के लिए नाम रख हीं लेते हैं।
विकाश और अनामिका.......
नाम के बाद अब हम इस 17 घंटे के सफर को तिन पार्ट में तय करेंगे। राँची से दिल्ली पहुँचना ऐसे कुछ खास बात तो है नहीं पर कुछ पल खास हो जाते हैं।





पार्ट1.....
शाम के 4:30 बजे राजधानी' अपनी निर्धारित समय पर स्टेशन पहूँचती है।  विकाश अपने बैग के साथ बोगी में जाता है उसकी नजर सामने वाली बर्थ पर समान रख रही एक लड़की पर पड़ती है। क़ायदे से तो विकाश की आँखे वहीं ठहर जानि चाहिए थी और पहली नज़र वाला प्यार भी हो जाना हीं चाहिए था.....पर ऐसा कुछ होता नहीं है। विकाश अपने दोस्तों से गले मिल रहा होता है, उसकी आँखे में थोड़ी नमी होती है...जल्द मुलाकात होगी ये फ़साने दोहराये जा रहे होते हैं।।  विकाश के दोस्त पूरी बोगी में तब तक अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके होते हैं।ट्रेन के चलने में अब भी कुछ 10 मिनट का समय बचा है। विकाश के दोस्त लोगो के समान रखने में और उन्हें उनकी सीट तक पहुंचाने में उनकी उनकी मदत करते भी नजर आ रहे थे,  अब उनका ट्रेन से उतरने का समय आ चुका है वो फिर से अपनी दोस्ती का परिचय  दे रहे होते हैं☺ अच्छे से जाना जा कर कॉल करना न जाने क्या-क्या कायदे से तो यह सब अनामिका के साथ होना चाहिए था पर वो चुपचाप बैठ कर फोन देख रही होती है।
ट्रेन की सिटी  बचती है सारे दोस्त नीचे उतरते हैं विकाश भी दरवाजे पर खड़ा है....ट्रेन खुल चुकी है। विकाश की निगाहें न जाने कब तक पीछे देखती रहीं होंगी । विकाश के दोस्तो का काम इस कहानी में बस इतना हीं था।
विकाश अंदर आता है अब फिर से उसकी नजर अनामिका की ओर जाती है इस बार उसका देखना कुछ खास होता है, अनामिका अभी भी अपने फोन में कुछ देख रही है....उसे खिड़की वाली सीट भी नहीं मिल पाई है। और उसके कम्पार्टमेंट में इतनी भीड़ है कि विकाश वहाँ जा कर तो कतई नहीं बैठ सकता पर अगर ऐसा हीं होता हो कहानी आगे बढ़ती हीं नहीं .......पर कहानी तो आगे बढ़नी है
सफर की पूरी कहानी अगले पार्ट में......

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